Sunday, 25 February 2018

‘मन की बात’ (41वीं कड़ी) ,प्रसारण तिथि: 25.02.2018


‘मन की बात’ (41वीं कड़ी)
प्रसारण तिथि: 25.02.2018


मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार |
आज प्रारम्भ में ही ‘मन की बात’ एक फ़ोन-कॉल से ही शुरू करते हैं |
(फ़ोन # )
आदरणीय प्रधानमंत्री जी, मैं कोमल त्रिपाठी मेरठ से बोल रही हूँ.. 28 तारीख को national science day है ... India की progress और  उसका growth, science से पूरी तरह से जुड़ा हुआ है .. जितना ही हम इसमें research और innovation करेंगे उतना ही हम आगे बढ़ेंगे और prosper करेंगे .. क्या आप हमारे युवाओं को motivate करने के लिए कुछ ऐसे शब्द कह सकते हैं जिससे कि वो scientific  तरीक़े से अपनी सोच को आगे बढाएं और हमारे देश को भी आगे बढ़ा सकें ..धन्यवाद .

आपके फ़ोन-कॉल के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद | विज्ञान को लेकर ढ़ेर सारे प्रश्न मेरे युवा साथियों ने मुझसे पूछे हैं, कुछ-न-कुछ लिखते रहते हैं | हमने देखा है कि समुन्दर का रंग नीला नज़र आता है लेकिन हम अपने दैनिक जीवन के अनुभवों से जानते हैं कि पानी का कोई रंग नहीं होता है | क्या कभी हमने सोचा है कि नदी हो, समुन्दर हो, पानी रंगीन क्यों हो जाता है ? यही प्रश्न 1920 के दशक में एक युवक के मन में आया था | इसी प्रश्न ने आधुनिक भारत के एक महान वैज्ञानिक को जन्म दिया | जब हम विज्ञान की बात करते हैं तो सबसे पहले भारत-रत्न सर सी.वी. रमन का नाम हमारे सामने आता है | उन्हें light scattering यानि प्रकाश के प्रकीर्णन पर उत्कृष्ट कार्य के लिए नोबल-पुरस्कार प्रदान किया गया था | उनकी एक ख़ोज ‘Raman effect’ के नाम से प्रसिद्ध है | हम हर वर्ष 28 फ़रवरी को ‘National Science Day मनाते हैं क्योंकि कहा जाता है कि इसी दिन उन्होंने light scattering की घटना की ख़ोज की थी | जिसके लिए उन्हें नोबल- पुरस्कार दिया गया | इस देश ने विज्ञान के क्षेत्र में कई महान वैज्ञानिकों को जन्म दिया है | एक तरफ़ महान गणितज्ञ बोधायन, भास्कर, ब्रह्मगुप्त और आर्यभट्ट की परंपरा रही है तो दूसरी तरफ़ चिकित्सा के क्षेत्र में सुश्रुत और चरक हमारा गौरव हैं | सर जगदीश चन्द्र बोस और हरगोविंद खुराना से लेकर सत्येन्द्र नाथ बोस जैसे वैज्ञानिक-ये भारत के गौरव हैं | सत्येन्द्र नाथ बोस के नाम पर तो famous particle Boson’ का नामकरण भी किया गया | हाल ही मुझे मुम्बई में एक कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला -  Wadhwani Institute for Artificial Intelligence के उद्घाटन का | विज्ञान के क्षेत्र में जो चमत्कार हो रहे हैं, उनके बारे में जानना बड़ा दिलचस्प  था |  Artificial Intelligence के माध्यम से Robots, Bots और specific task करने वाली मशीनें बनाने में सहायता मिलती है | आजकल मशीनें self learning से अपने आप के intelligence को और smart बनाती जाती हैं | इस technology का उपयोग ग़रीबों, वंचितों या ज़रुरतमंदों का जीवन बेहतर करने के काम आ सकता है | Artificial Intelligence के उस कार्यक्रम में मैंने वैज्ञानिक समुदाय से आग्रह किया कि दिव्यांग भाइयों और बहनों का जीवन सुगम बनाने के लिए, किस तरह से Artificial Intelligence से मदद मिल सकती है ? क्या हम Artificial Intelligence के माध्यम से प्राकृतिक आपदाओं के बारे में बेहतर अनुमान लगा सकते हैं ? किसानों को फ़सलों की पैदावार को लेकर कोई सहायता कर सकते हैं ? क्या Artificial Intelligence स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच को आसान बनाने और आधुनिक तरीक़े से बीमारियों के इलाज़ में सहायक हो सकता है ?
 
पिछले दिनों इज़राइल के प्रधानमंत्री के साथ मुझे गुजरात में, अहमदाबाद में ‘I Create’ के उद्घाटन के लिए जाने का अवसर मिला था | वहाँ एक नौजवान ने, एक ऐसा digital instrument develop किया हुआ बताया उसने कि जिसमें अगर कोई बोल नहीं सकता है तो उस instrument के माध्यम से अपनी बात लिखते ही वो voice में convert होती है और आप वैसे ही सम्वाद कर सकते हैं जैसे कि एक बोल सकने वाले व्यक्ति के साथ आप करते हैं | मैं समझता हूँ कि Artificial Intelligence का उपयोग ऐसी कई विधाओं में हम कर सकते हैं |

Science and Technology, value neutral होती हैं | इनमें मूल्य, अपने आप नहीं होते हैं | कोई भी मशीन वैसा ही कार्य करेगी जैसा हम चाहेंगे | लेकिन, यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम मशीन से क्या काम लेना चाहते हैं | यहाँ पर मानवीय-उद्धेश्य महत्वपूर्ण हो जाता है | विज्ञान का मानव-मात्र कल्याण के लिए उपयोग, मानव जीवन की सर्वोच्च ऊंचाइयों को छूने के लिए प्रयोग |

Light Bulb का आविष्कार करने वाले Thomas Alva Edison अपने प्रयोगों में कई बार असफ़ल रहे | एक बार उनसे जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया “मैंने Light Bulb नहीं बनाने के दस हज़ार तरीक़े खोज़े हैं”, यानि Edison ने अपनी असफलताओं को भी अपनी शक्ति बना लिया | संयोग से सौभाग्य है कि आज मैं महर्षि अरबिन्दो की कर्मभूमि ‘Auroville’ में हूँ | एक क्रांतिकारी के रूप में उन्होंने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी, उनके ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी, उनके शासन पर सवाल उठाए | इसी प्रकार उन्होंने एक महान ऋषि के रूप में, जीवन के हर पहलू के सामने सवाल रखा | उत्तर खोज़ निकाला और मानवता को राह दिखाई | सच्चाई को जानने के लिए बार-बार प्रश्न पूछने की भावना, महत्वपूर्ण है | वैज्ञानिक ख़ोज के पीछे की असल प्रेरणा भी तो यही है | तब तक चैन से नहीं बैठना चाहिये जब तक क्यों, क्या और कैसे जैसे प्रश्नों का उत्तर न मिल पाए | National Science Day  के अवसर पर हमारे वैज्ञानिकों, विज्ञान से जुड़े सभी लोगों को मैं बधाई देता हूँ | हमारी युवा-पीढ़ी, सत्य और ज्ञान की खोज़ के लिए प्रेरित हो, विज्ञान की मदद से समाज की सेवा करने के लिए प्रेरित हो, इसके लिए मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएँ हैं |

साथियो, crisis के समय safety, disaster इन सारे विषयों पर मुझे बहुत बार बहुत कुछ सन्देश आते रहते हैं, लोग मुझे कुछ-न-कुछ लिखते रहते हैं | पुणे से श्रीमान रवीन्द्र सिंह ने NarendraModi mobile App पर अपने comment में occupational safety पर बात की है | उन्होंने लिखा है कि हमारे देश में factories और constructions sites पर safety standards उतने अच्छे नहीं हैं | अगले 4 मार्च को भारत का National Safety Day है, तो प्रधानमंत्री अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में safety पर बात करें ताकि लोगों में safety को लेकर जागरूकता बढ़े | जब हम public safety  की बात करते हैं तो दो चीज़ें बहुत महत्वपूर्ण होती हैं pro-activeness और दूसरा है preparedness | safety दो प्रकार की होती है एक वो जो आपदा के समय जरुरी होती है, safety during disasters और दूसरी वो जिसकी दैनिक जीवन में आवश्यकता पड़ती है, safety in everyday life | अगर हम दैनिक जीवन में safety को लेकर जागरूक नहीं हैं, उसे हासिल नहीं कर पा रहे हैं तो फिर आपदा के दौरान इसे पाना मुश्किल हो जाता है | हम सब बहुत बार रास्तों पर लिखे हुए board पढ़ते हैं | उसमें लिखा होता है –

- “सतर्कता हटी-दुर्घटना घटी”,
- “एक भूल करे नुकसान, छीने खुशियाँ और मुस्कान”,
- “इतनी जल्दी न दुनिया छोड़ो, सुरक्षा से अब नाता जोड़ो”
- “सुरक्षा से न करो कोई मस्ती, वर्ना ज़िंदगी होगी सस्ती”    

 उससे आगे उन वाक्य का हमारे जीवन में कभी-कभी कोई उपयोग ही नहीं होता है | प्राकृतिक आपदाओं को अगर छोड़ दें तो ज़्यादातर दुर्घटनाएँ, हमारी कोई-न-कोई गलती का परिणाम होती हैं | अगर हम सतर्क रहें, आवश्यक नियमों का पालन करें तो हम अपने जीवन की रक्षा तो कर ही सकते हैं, लेकिन, बहुत बड़ी दुर्घटनाओं से भी हम समाज को बचा सकते हैं | कभी-कभी हमने देखा है कि work place पर safety को लेकर बहुत सूत्र लिखे गए होते हैं लेकिन जब देखते हैं तो कहीं पर उसका पालन नज़र नहीं आता है | मेरा तो आग्रह है कि महानगर पालिका, नगर पालिकाएँ जिनके पास fire brigade होते हैं उन्हें हफ़्ते में एक बार या महीने में एक बार अलग-अलग स्कूलों में जा करके स्कूल के बच्चों के सामने mock drill  करना चाहिये | उससे दो फायदे होंगे - fire brigade को भी सतर्क रहने की आदत रहती है और नयी पीढ़ी को इसकी शिक्षा भी मिलती है और इसके लिए न कोई अलग खर्चा होता है - एक प्रकार से शिक्षा का ही एक क्रम बन जाता है और मैं हमेशा इस बात का आग्रह करता रहता हूँ | जहाँ तक आपदाओं की बात है, disasters की बात है, तो भारत भौगोलिक और जलवायु की दृष्टि से विविधताओं से भरा हुआ देश है | इस देश ने कई प्राक्रतिक और मानव-निर्मित आपदाएँ, जैसे रासायनिक एवं औद्योगिक दुर्घटनाओं को झेला है | आज National Disaster Management Authority यानी NDMA देश में आपदा-प्रबंधन की अगुवाई कर रहा है | भूकंप हो, बाढ़ हो, Cyclone हो, भूस्खलन हो जैसे विभिन्न आपदाओं को, rescue operation हो, NDMA तुरंत पहुँचता है | उन्होंने guidelines भी जारी किये हैं, साथ-साथ वो capacity building के लिए लगातार training के काम भी करते रहते हैं | बाढ़, cyclone के खतरे में होने वाले ज़िलों में volunteers के प्रशिक्षण के लिए भी ‘आपदा मित्र’ नाम की पहल की गई है | प्रशिक्षण और जागरूकता का बहुत महत्वपूर्ण रोल है | आज से दो-तीन साल पहले लू heat wave से प्रतिवर्ष हजारों लोग अपनी जान गवाँ देते थे | इसके बाद NDMA ने heat wave के प्रबंधन के लिए workshop आयोजित किये, लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए अभियान चलाया | मौसम विभाग ने सटीक पूर्वानुमान लगाये | सबकी भागीदारी से एक अच्छा परिणाम सामने आया | 2017 में लू से होने वाली मौतों की संख्या अप्रत्याशित रूप से घटकर क़रीब-क़रीब 220 पर आ गई | इससे पता चलता है कि अगर हम सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं, हम सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं | समाज में इस प्रकार से काम करने वाले अनगिनत लोग हों, सामाजिक संगठन हों, जागरूक नागरिक हों - मैं उन सब की सराहना करना चाहता हूँ, जो कहीं पर भी आपदा हो मिनटों के अन्दर राहत और बचाव कार्य में जुट जाते हैं | और ऐसे गुमनाम heroes की संख्या कोई कम नहीं है | हमारी Fire and Rescue Services, National Disaster Response Forces, सशस्त्र सेनाएँ, Paramilitary Forces, ये भी संकट के समय पहुँचने वाले वीर बहादुर अपनी जान की परवाह किये बिना लोगों की मदद करते हैं | NCC, Scouts जैसे संगठन भी इन कामों को आजकल कर भी रहे हैं, training भी कर रहे हैं | पिछले दिनों हमने एक प्रयास ये भी शुरू किया है कि जैसे दुनिया के देशों में joint military exercise होती है तो क्यों न दुनिया के देश Disaster Management के लिए भी joint exercise करें | भारत ने इसको lead किया है – BIMSTEC, बांग्लादेश, भारत, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, भूटान और नेपाल, इन देशों की एक joint disasters management exercise  भी की गई, ये अपने आप में एक पहला और बड़ा मानवीय प्रयोग था | हमें एक risk conscious society बनना होगा | अपनी संस्कृति में हम मूल्यों की रक्षा, safety of values के बारे में तो अक्सर बातें करते हैं, लेकिन हमें values of safety, सुरक्षा के मूल्यों को भी समझना होगा | हमें उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा | हमारे सामान्य जीवन में हमने देखा है कि हम सैकड़ों बार हवाई जहाज में यात्रा करते हैं और हवाई जहाज के अंदर air hostess प्रारंभ में safety के संबंध में सूचनाएँ देती है | हम सब ने सौ-बार इसको सुना होगा लेकिन आज हमें कोई हवाई जहाज में ले जा करके खड़ा करे और पूछे कि बताइये कौन सी चीज़ कहाँ है ? life jacket कहाँ है ? कैसे उपयोग करना चाहिए ? मैं दावे से कहता हूँ हममें से कोई नहीं बता पायेगा | मतलब ये हुआ कि क्या जानकारी देने की व्यवस्था थी ? थी | प्रत्यक्ष उस तरफ़ नज़र करके देखने के लिए सम्भावना थी ? थी | लेकिन हमने किया नहीं | क्यों ? क्योंकि हम स्वभाव से conscious नहीं हैं और इसलिए हमारे कान, हवाई जहाज बैठने के बाद सुनते तो हैं लेकिन ‘ये सूचना मेरे लिए है’ ऐसा हममें से किसी को लगता ही नहीं है | वैसा ही जीवन के हर क्षेत्र में हमारा अनुभव है | हम ये न सोचें कि safety किसी और के लिए है, अगर हम सब अपनी safety के लिए सजग हो जाएँ तो समाज की safety का भाव भी अन्तर्निहित होता है |

    मेरे प्यारे देशवासियो, इस बार बजट में ‘स्वच्छ भारत’ के तहत गाँवों के लिए बायोगैस के माध्यम से waste to wealth और waste to energy बनाने पर ज़ोर दिया गया | इसके लिए पहल शुरू की गई और इसे नाम दिया गया ‘GOBAR-Dhan’ - Galvanizing Organic Bio-Agro Resources | इस ‘GOBAR-Dhan’ योजना का उद्देश्य है, गाँवों को स्वच्छ बनाना और पशुओं के गोबर और खेतों के ठोस अपशिष्ट पर्दाथों को COMPOST और BIO-GAS में परिवर्तित कर, उससे धन और ऊर्जा generate करना | भारत में मवेशियों की आबादी पूरे विश्व में सबसे ज़्यादा है | भारत में मवेशियों की आबादी लगभग 30 करोड़ है और गोबर का उत्पादन प्रतिदिन लगभग 30 लाख टन है | कुछ यूरोपीय देश और चीन पशुओं के गोबर और अन्य जैविक अपशिष्ट  का उपयोग ऊर्जा के उत्पादन के लिए करते हैं लेकिन भारत में इसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं हो रहा था | ‘स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण’ के अंतर्गत अब इस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं |      
  मवेशियों के गोबर, कृषि से निकलने वाले कचरे, रसोई घर से निकलने वाला कचरा, इन सबको बायोगैस आधारित उर्जा बनाने के लिए इस्तेमाल करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है | ‘गोबर धन योजना’ के तहत ग्रामीण भारत में किसानों, बहनों, भाइयों को प्रोत्साहित किया जाएगा कि वो गोबर और कचरे को सिर्फ waste के रूप में नहीं बल्कि आय के स्रोत के रूप में देखें | ‘गोबर धन योजना’ से ग्रामीण क्षेत्रों को कई लाभ मिलेंगे | गांव को स्वच्छ रखने में मदद मिलेगी | पशु-आरोग्य बेहतर होगा और उत्पादकता बढ़ेगी | बायोगैस से खाना पकाने और lighting के लिए ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी | किसानों एवं पशुपालकों को आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी |  Waste collection, transportation, बायोगैस की बिक्री आदि के लिए नई नौकरियों के अवसर मिलेंगे | ‘गोबर धन योजना’ के सुचारू व्यवस्था के लिए एक online trading platform भी बनाया जाएगा जो किसानों को खरीदारों से connect करेगा ताकि किसानों को गोबर और agriculture waste का सही दाम मिल सके | मैं उद्यमियों, विशेष रूप से ग्रामीण भारत में रह रही अपनी बहनों से आग्रह करता हूँ कि आप आगे आयें | Self Help Group बनाकर, सहकारी समितियां बनाकर इस अवसर का पूरा लाभ उठाएं | मैं आपको आमंत्रित करता हूँ clean energy and green jobs के इस आन्दोलन के भागीदार बनें | अपने गाँव में waste को wealth में परिवर्तन करने और गोबर से गोबर-धन बनाने की दिशा में पहल करें | 
   मेरे प्यारे देशवासियो, आज तक हम music festival, food festival, film festival न जाने कितने-कितने प्रकार के festival के बारे में सुनते आए हैं  | लेकिन छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक अनूठा प्रयास करते हुए राज्य का पहला ‘कचरा महोत्सव’ आयोजित किया गया | रायपुर नगर निगम द्वारा आयोजित इस महोत्सव के पीछे जो उद्देश्य था वह था स्वच्छता को लेकर जागरूकता | शहर के waste का creatively use करना और garbage को re-use करने के विभिन्न तरीकों के बारे में जागरूकता पैदा करना | इस महोत्सव के दौरान तरह-तरह की activity हुई जिसमें छात्रों से लेकर बड़ों तक, हर कोई शामिल हुआ | कचरे का उपयोग करके अलग-अलग तरह की कलाकृतियाँ बनाई गईं | Waste management के सभी पहलूओं पर लोगों को शिक्षित करने के लिए workshop आयोजित किये गए | स्वच्छता के theme पर music performance हुई | Art work बनाए गए | रायपुर से प्रेरित होकर अन्य ज़िलों में भी अलग-अलग तरह के कचरा उत्सव हुए | हर किसी ने अपनी-अपनी तरफ से पहल करते हुए स्वच्छता को लेकर innovative ideas, share किये, चर्चाएं की, कविता पाठ हुए | स्वच्छता को लेकर एक उत्सव-सा माहौल तैयार हो गया | खासकर स्कूली बच्चों ने जिस तरह बढ़-चढ़ करके भाग लिया, वह अद्भुत था | Waste management और स्वच्छता के महत्व को जिस अभिनव तरीक़े से इस महोत्सव में प्रदर्शित किया गया, इसके लिए रायपुर नगर निगम, पूरे छत्तीसगढ़ की जनता और वहां की सरकार और प्रशासन को मैं ढ़ेरों बधाइयाँ देता हूँ |
    हर वर्ष 8 मार्च को ‘अन्तरराष्ट्रीय महिला-दिवस’ मनाया जाता है | देश और दुनिया में कई सारे कार्यक्रम होते हैं | इस दिन देश में ‘नारी शक्ति पुरस्कार’ से ऐसी महिलाओं को सत्कार भी किया जाता है जिन्होंने बीते दिनों में भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अनुकरणीय कार्य किया हो | आज देश woman development से आगे woman-lead development की ओर बढ़ रहा है | आज हम महिला विकास से आगे महिला के नेतृत्व में विकास की बात कर रहे हैं | इस अवसर पर मुझे स्वामी विवेकानंद के वचन याद आते हैं | उन्होंने कहा था ‘the idea of perfect womanhood is perfect independence’- सवा-सौ वर्ष पहले स्वामी जी का यह विचार भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति के चिंतन को व्यक्त करता है | आज सामाजिक, आर्थिक जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं की बराबरी की भागीदारी सुनिश्चित करना यह हम सबका कर्तव्य है, यह हम सबकी जिम्मेवारी है | हम उस परंपरा का हिस्सा है, जहाँ पुरुषों की पहचान नारियों से होती थी | यशोदा-नंदन, कौशल्या-नंदन, गांधारी-पुत्र, यही पहचान होती थी किसी बेटे की | आज हमारी नारी शक्ति ने अपने कार्यों से आत्मबल और आत्मविश्वास का परिचय दिया है | स्वयं को आत्मनिर्भर बनाया है | उन्होंने ख़ुद को तो आगे बढाया ही है, साथ ही देश और समाज को भी आगे बढ़ाने और एक नए मुक़ाम पर ले जाने का काम किया है | आख़िर हमारा ‘New India’ का सपना यही तो है जहाँ नारी सशक्त हो, सबल हो, देश के समग्र विकास में बराबर की भागीदार हो | पिछले दिनों मुझे एक बहुत ही बढ़िया सुझाव किसी महाशय ने दिया था | उन्होंने सुझाव दिया था कि 8 मार्च, ‘महिला दिवस’ मनाने के भाँति- भाँति के कार्यक्रम होते हैं | क्या हर गाँव-शहर में जिन्होंने 100 वर्ष पूर्ण किये हैं ? ऐसी माताओं-बहनों का सम्मान का कार्यक्रम आयोजित हो सकता है क्या ? और उसमें एक लम्बे जीवन की बातें की जा सकती हैं क्या ? मुझे विचार अच्छा लगा, आप तक पहुँचा रहा हूँ | नारी शक्ति क्या कर सकती है, आपको ढ़ेर सारे उदाहरण  मिलेंगे | अगर आप अगल-बगल में झाकेंगे तो कुछ-न-कुछ ऐसी कहानियाँ आपके जीवन को प्रेरणा देंगी | अभी-अभी झारखण्ड से मुझे एक समाचार मिला | ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के अंतर्गत झारखण्ड में लगभग 15 लाख महिलाओं ने - यह आँकड़ा छोटा नहीं है | 15 लाख महिलाओं ने संगठित होकर एक माह का स्वच्छता अभियान चलाया | 26 जनवरी, 2018 से प्रारंभ हुए इस अभियान के अंतर्गत मात्र 20 दिन में इन महिलाओं ने 1 लाख 70 हजार शौचालयों का निर्माण कर एक नई मिसाल कायम की है | इसमें करीब 1 लाख सखी मंडल सम्मिलित हैं | 14 लाख महिलाएँ, 2 हजार महिला पंचायत प्रतिनिधि, 29 हजार जल-सहिया, 10 हज़ार महिला स्वच्छाग्रही तथा 50 हजार महिला राज मिस्त्री | आप कल्पना कर सकते हैं कि कितनी बड़ी घटना है! झारखण्ड की इन महिलाओं ने दिखाया है कि नारी शक्ति, स्वच्छ भारत अभियान की एक ऐसी शक्ति है, जो सामान्य जीवन में स्वच्छता के अभियान को, स्वच्छता के संस्कार को प्रभावी ढंग से जन-सामान्य के स्वभाव में परिवर्तित करके रहेगी |
भाइयो-बहनो, अभी दो दिन पहले मैं न्यूज़ में देख रहा था कि एलीफेंटा द्वीप के तीन गाँवों में आज़ादी के 70 वर्ष बाद बिजली पहुँची है और इसे लेकर वहाँ के लोगों में कितना हर्ष और उत्साह है | आप सब भलीभाँति जानते हैं, एलीफेंटा द्वीप, मुंबई से समुद्र में दस  किलोमीटर दूर है | यह पर्यटन का एक बहुत बड़ा और आकर्षक केंद्र है | एलीफेंटा की गुफाएँ, UNESCO के World Heritage हैं | वहाँ हर दिन देश-विदेश से बहुत बड़ी मात्रा में पर्यटक आते हैं | एक महत्वपूर्ण tourist destination है | मुझे यह बात जानकर हैरानी हुई कि मुम्बई के पास होने और पर्यटन का इतना बड़ा केंद्र होने के बावजूद, आज़ादी के इतने वर्षों तक एलीफेंटा में बिजली नहीं पहुँची हुई | 70 वर्षों तक एलीफेंटा द्वीप के तीन गाँव राजबंदर, मोरबंदर और सेंतबंदर, वहाँ के लोगों की ज़िन्दगी में जो अँधेरा छाया था, अब जाकर वह अँधेरा छठा है और उनका जीवन रोशन हुआ है | मैं वहाँ के प्रशासन और जनता को बधाई देता हूँ | मुझे ख़ुशी है कि अब एलीफेंटा के गाँव और एलीफेंटा की गुफाएँ बिजली से रोशन होंगे | ये सिर्फ़ बिजली नहीं, लेकिन विकास के दौर की एक नयी शुरुआत है | देशवासियो का जीवन रोशन हो, उनके जीवन में खुशियाँ आएँ इससे बढकर संतोष और ख़ुशी का पल क्या हो सकता है |
मेरे प्यारे भाइयो-बहनो, अभी-अभी हम लोगों ने शिवरात्रि का महोत्सव मनाया | अब मार्च का महीना लहलहाते फसलों से सजे खेत, अठखेलियाँ करती गेंहूँ की सुनहरी बालियाँ और मन को पुलकित करने वाली आम के मंजर की शोभा - यही तो इस महीने की विशेषता है | लेकिन यह महीना होली के त्योंहार के लिए भी हम सभी का अत्यंत प्रिय है | दो मार्च को पूरा देश होली का उत्सव हर्षोल्लास से मनाएगा | होली में जितना महत्व रंगों का है उतना ही महत्व ‘होलिका दहन’ का भी है क्योंकि यह दिन बुराइयों को अग्नि में जलाकर नष्ट करने का दिन है | होली सारे मन-मुटाव भूल कर एक साथ मिल बैठने, एक-दूसरे के सुख-आनंद में सहभागी बनने का शुभ अवसर है और प्रेम एकता तथा भाई-चारे का सन्देश देता है | आप सभी देशवासियों को होली के रंगोत्सव की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ, रंग भरी शुभकामनाएँ | यह पर्व हमारे देशवासियों के जीवन में रंगबिरंगी खुशियों से भरा हुआ रहे - यही शुभकामना | मेरे प्यारे देशवासियो, बहुत-बहुत धन्यवाद नमस्कार |
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Tuesday, 13 February 2018

"World Radio Day" -by F.Sheheryar, DG,AIR

When Neil Diamond crooned “reaching out, touching me, touching you” in that iconic song Sweet Caroline, he could as well be singing about radio. Radio, which reaches out across seemingly insurmountable geographical divides, touches countless lives and yet remains in the background. Like a good friend who never pries but steps in on a bad day with alacrity as the world has witnessed again and again when natural disasters strike. When all new fangled media fail in the face of Nature’s fury, radio is that saviour that connects people, connects lives and connects hope.



It was to honour this radio that the United Nations proclaimed 13 February as World Radio Day in 2011, with the vision of celebrating how it helps shape our lives.
To quote from the UNESCO website, “by listening to its audiences and responding to their needs, radio provides the diversity of views and voices needed to address the challenges we all face.”

This is most relevant for the developing societies which are clearly disadvantaged by their lack of access to the latest information technologies. The switch to the global information super highway would give an unfair advantage to rich nations over the poor, feels the Third World which continues to root for radio. Radio broadcasting crosses the barriers of isolation and illiteracy and it is the cheapest electronic medium to broadcast and receive.
Though World Radio Day is only a 6-year-old, radio itself is a Long Playing story with India getting into the groove in 1927 with the setting up of the first station of the Indian Broadcasting Company in Bombay. It is in fact, a ninety-year-old story!
Radio perhaps faces the most impossible challenge in India with its population of 1.25 billion and humongous diversity in ethno-socio-linguistic characteristic, literacy levels, economic disparities, gender inequality, disparity in distribution of resources, rural-urban gulf, digital divide and so on.

The public service radio broadcaster All India Radio (AIR) has risen admirably to this challenge by its steadfast focus on the development of a learning society/a knowledge community, inculcating scientific temper, empowerment of women, amelioration of the underprivileged, spreading the message of planned parenthood, diffusion of agricultural innovation, rural regeneration, skill development to capture benefits of the demographic dividend, preserving and strengthening India’s cultural, linguistic and ethnic diversity and fortifying India’s democratic and secular traditions and values.
Fulsome praise for radio’s development initiatives came from no less than eminent agricultural scientist and Father of the Green Revolution, M S Swaminathan:
“Even those who were excluded from the technological transformation could be included because they heard about new technologies through radio. In fact, I remember in 1967 – 68, many farmers in UP and Bihar would call the new varieties of rice, wheat and other crops as radio varieties because they had heard about them on radio. This is why I would like to pay a tribute to All India Radio which is in some respects the unsung hero of the Green Revolution.”


What does radio mean to the world’s largest middle class society, a fast changing society at that? New radio seems to have created yet another division in and already fragmented milieu – the smart alec go getter minority versus the ordinary folk (spelt losers) majority.
In consonance with the concept of smart cities, what is urgently required are global middle class citizens to inhabit them, to avoid a sheer mismatch; creating an atmosphere of cerebral modernity paired with the best of national values and culture, ensuring inclusivity for all (not just a select smarter few). And that is what underscores the role and significance of the national public broadcaster, All India Radio. Armed with its motto (Bahujana hitaye bahujana sukhaye), pedigree and network, AIR possibly is the only national media institution left which has the wherewithal to address myriad sections of society in an unbiased and sensitive manner.

Before the misdirected disillusioned youth of India reach a stage where they are not able to speak a single legible sentence, before they begin to rebel violently on account of sheer cerebral inactivity, it is only All India Radio that is endowed with the capability to provide linguistic engagement and enrichment to today’s partly intellect deprived youth, a population that numbers dangerously high. A random audio survey done in any city/rural neighbourhood of the country will reveal the abyss of linguistic bankruptcy that our youth are gradually being dragged into. Public speaking is not part of the curriculum in our private schools, let alone the public ones. All India Radio, with its gigantic AM network has the power to pull them back to the mainstream of self development and hence nation building collectively.


Critics may argue that the wheels of this juggernaut inch a tad sluggishly; what they do not realise (or do not want to realise) is that nation building is not just radio ads and jock talk trying to sell one, two or three BHK houses – it is ensuring cultivation and preservation of the human element in HOMES, that too all homes.
Public Service Radio disseminates information in the most democratic manner. It speaks the language of the masses and it reaches the last man. Serving a variety of fare in variable formats – plays, news, talk shows, music, running commentaries, special programmes for special audiences, leaving none out.


Radio rules the imagination. Radio is theatre for the blind. Radio is an intimate story telling medium. Is it any wonder then that the Prime Minister of the world’s largest democracy should choose AIR over others for his intimate heart to heart talk with the citizens? As someone quipped, when it comes to radio, people are all ears! We can’t do better than to quote the Prime Minister himself when he said: “If we touch those questions (questions that touch the heart) we will be able to reach out to the common man.” No wonder, Mann ki Baat became an instant success as it decidedly is packaged with precision and put through on a dissemination network with vast domestic and global reach.
AIR is arguably one of the largest radio networks of the world, with 422 stations throughout the country, serving different segments of the population, including the underdog. You can’t have a more potent instrument than AIR for exchange of ideas between the country’s Prime Minister and his people. Indeed, Mann ki Baat epitomizes all that is best in public service broadcasting.
Radio is a Long Playing song that changes its beat with the times. It is adapting to 21st Century changes and offering new ways to interact and participate. Becoming more and more interactive. This explains why the theme for World Radio Day 2017 is “Radio is You!” – a call for greater participation of audiences and communities in the policy and planning of radio broadcasting. To quote UNESCO again, “Where social media and audience fragmentation can put us in media bubbles of like-minded people, radio is uniquely positioned to bring communities together and foster positive dialogue for change.”

Sunday, 28 January 2018

‘मन की बात’ (40 वीं कड़ी) प्रसारण तिथि: 28.01.2018


मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार | 2018 की यह पहली ‘मन की बात’ है और दो दिन पूर्व ही हमने गणतन्त्र पर्व को बहुत ही उत्साह के साथ और इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि 10 देशों के मुखिया इस समारोह में उपस्थित रहे | 
मेरे प्यारे देशवासियो, मैं आज श्रीमान प्रकाश त्रिपाठी ने NarendraModiApp पर एक लम्बी चिट्ठी लिखी है और मुझसे बहुत आग्रह किया है कि मैं उनके पत्र में लिखे गए विषयों को स्पर्श करूँ | उन्होंने लिखा है, 1 फरवरी को अन्तरिक्ष में जाने वाली कल्पना चावला की पुण्य तिथि है | कोलंबिया अन्तरिक्षयान दुर्घटना में वो हमें छोड़ कर चली गयीं लेकिन दुनिया भर में लाखों युवाओं को प्रेरणा दे गयी | मैं भाई प्रकाश जी का आभारी हूँ कि उन्होंने अपनी लम्बी चिट्ठी में कल्पना चावला की विदाई से प्रारम्भ किया है | यह सबके लिए दुःख की बात है कि हमने कल्पना चावला जी को इतनी कम उम्र में खो दिया लेकिन उन्होंने अपने जीवन से पूरे विश्व में, ख़ासकर भारत की हज़ारों लड़कियों को, यह संदेश दिया कि नारी-शक्ति के लिए कोई सीमा नहीं है | इच्छा और दृढ़ संकल्प हो, कुछ कर गुजरने का ज़ज्बा हो तो कुछ भी असंभव नहीं है | यह देखकर काफी खुशी होती है कि भारत में आज महिलाएँ  हर क्षेत्र में तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं और देश का गौरव बढ़ा रही हैं |
प्राचीन काल से हमारे देश में महिलाओं का सम्मान, उनका समाज में स्थान और उनका योगदान, यह पूरी दुनिया को अचंभित करता आया है | भारतीय विदुषियों की लम्बी परम्परा रही है | वेदों की ऋचाओं को गढ़ने में भारत की बहुत-सी विदुषियों का योगदान रहा है | लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी न जाने कितने ही नाम हैं | आज हम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की बात करते हैं लेकिन सदियों पहले हमारे शास्त्रों में,स्कन्द-पुराण में,कहा गया है:-
दशपुत्र, समाकन्या, दशपुत्रान प्रवर्धयन् |
यत् फलं लभतेमर्त्य, तत् लभ्यं  कन्यकैकया ||
अर्थात, एक बेटी दस बेटों के बराबर है | दस बेटों से जितना पुण्य मिलेगा एक बेटी से उतना ही पुण्य मिलेगा | यह हमारे समाज में नारी के महत्व को दर्शाता है | और तभी तो, हमारे समाज में नारी को ‘शक्ति’ का दर्जा दिया गया है | यह नारी शक्ति पूरे देश को, सारे समाज को, परिवार को, एकता के सूत्र में बाँधती है | चाहे वैदिक काल की विदुषियां लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी की विद्वता हो या अक्का महादेवी और मीराबाई का ज्ञान और भक्ति हो, चाहे अहिल्याबाई होलकर की शासन व्यवस्था हो या रानी लक्ष्मीबाई की वीरता, नारी शक्ति हमेशा हमें प्रेरित करती आयी है | देश का मान-सम्मान बढ़ाती आई है |
श्रीमान प्रकाश त्रिपाठी ने आगे कई सारे उदाहरण दिए हैं | उन्होंने लिखा है हमारी साहसिक रक्षा-मंत्री निर्मला सीतारमण के लड़ाकू विमान ‘सुखोई 30’ में उड़ान भरना, उन्हें प्रेरणा दे देगा | उन्होंने वर्तिका जोशी के नेतृत्व में भारतीय नौसेना के महिला क्रू मेम्बर्स आई एन एस वी तरिणी (INSV Tarini) पर पूरे विश्व की परिक्रमा कर रही हैं ,उसका ज़िक्र  किया है | तीन बहादुर महिलाएँ भावना कंठ, मोहना सिंह और अवनी चतुर्वेदी Fighter Pilots बनी हैं और Sukhoi-30  में प्रशिक्षण ले रही हैं | क्षमता वाजपेयी की अगुवाई वाली All Women Crue ने दिल्ली से अमेरिका के San Francisco और वापस दिल्ली तक Air India Boeing Jet में उड़ान भरी - और सब की सब महिलाएँ  | आपने बिलकुल सही कहा -  आज नारी, हर क्षेत्र में न सिर्फ आगे बढ़ रही है बल्कि नेतृत्व कर रही है |  आज कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ सबसे पहले, हमारी नारी-शक्ति कुछ करके दिखा रही है | एक milestone स्थापित कर रही है |  पिछले दिनों माननीय राष्ट्रपति जी ने एक नई पहल की |
  राष्ट्रपति जी ने उन असाधारण महिलाओं के एक group  से मुलाकात की जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में सबसे पहले कुछ करके दिखाया | देश की ये women achievers , First female Merchant Navy Captain , passenger train की पहली महिला Train Driver, पहली महिला Fire Fighter, पहली महिला Bus Driver, Antarctica पहुँचने वाली पहली महिला, ऐवरेस्ट पर पहुँचने वाली पहली महिला, इस तरह से हर क्षेत्र में ‘First Ladies’-  हमारी नारी-शक्तियों ने समाज की रूढ़िवादिता को तोड़ते हुए असाधारण उपलब्धियाँ हासिल की, एक कीर्तिमान स्थापित किया | उन्होंने ये दिखाया कि कड़ी मेहनत, लगन और दृढसंकल्प के बल पर तमाम बाधाओं और रुकावटों को पार करते हुए एक नया मार्ग तैयार किया जा सकता है | एक ऐसा मार्ग जो सिर्फ अपने समकालीन लोगों को बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करेगा | उन्हें एक नये जोश और उत्साह से भर देगा | इन women achievers, first ladies पर एक पुस्तक भी तैयार की गयी है ताकि पूरा देश इन नारी शक्तियों के बारे में जाने, उनके जीवन और उनके कार्यों से प्रेरणा ले सके | यह NarendraModi website  पर भी e-book के रूप में उपलब्ध है |
  आज देश और समाज में हो रहे सकारात्मक बदलाव में देश की नारी-शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है | आज जब हम महिला सशक्तीकरण पर चर्चा कर रहे हैं तो मैं एक रेलवे स्टेशन का ज़िक्र करना चाहूँगा | एक रेलवे स्टेशन और महिला सशक्तीकरण, आप सोच रहे होंगे कि इस बीच में क्या connection है | मुंबई का माटुंगा स्टेशन भारत का ऐसा पहला स्टेशन है जहाँ सारी महिला कर्मचारी हैं | सभी विभागों में women staff - चाहे Commercial Department हो, Railway Police हो, Ticket Checking हो, Announcing हो, Point Person हो, पूरा 40 से भी अधिक महिलाओं का staff है | इस बार बहुत से लोगों ने गणतंत्र दिवस की परेड देखने के बाद Twitter पर और दूसरे Social Media पर लिखा कि परेड की एक मुख्य बात थी, BSF Biker Contingent जिसमें सब की सब महिलाएँ भाग ले रहीं थी | साहसपूर्ण प्रयोग कर रही थीं और ये दृश्य, विदेश से आये हुए मेहमानों को भी आश्चर्यचकित कर रहा था | सशक्तीकरण, आत्मनिर्भरता का ही एक रूप है | आज हमारी नारी-शक्ति नेतृत्व कर रही है | आत्मनिर्भर बन रही है | वैसे ही एक बात मेरे ध्यान में आई है, छत्तीसगढ़ की हमारी आदिवासी महिलाओं ने भी कमाल कर दिया है | उन्होंने एक नई मिसाल पेश की है | आदिवासी महिलाओं का जब ज़िक्र आता है तो सभी के मन में एक निश्चित तस्वीर उभर कर आती है | जिसमें जंगल होता है, पगडंडियां होती हैं, उन पर लकड़ियों का बोझ सिर पर उठाये चल रही महिलाएँ | लेकिन छत्तीसगढ़ की हमारी आदिवासी नारी, हमारी इस नारी-शक्ति ने देश के सामने एक नई तस्वीर बनाई है | छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा इलाक़ा, जो माओवाद-प्रभावित क्षेत्र है | हिंसा, अत्याचार, बम, बन्दूक, पिस्तौल - माओवादियों ने इसी का एक भयानक वातावरण पैदा किया हुआ है | ऐसे ख़तरनाक इलाक़े में आदिवासी महिलाएँ, E-Rickshaw चला कर आत्मनिर्भर बन रही हैं | बहुत ही थोड़े कालखंड में कई सारी महिलाएँ इससे जुड़ गयी हैं | और इससे तीन लाभ हो रहे हैं, एक तरफ जहाँ स्वरोजगार ने उन्हें सशक्त बनाने का काम किया है वहीँ  इससे माओवाद-प्रभावित इलाक़े की तस्वीर भी बदल रही है | और इन सबके साथ इससे पर्यावरण-संरक्षण के काम को भी बल मिल रहा है | यहाँ के ज़िला प्रशासन की भी सराहना करता हूँ, Grant उपलब्ध कराने से ले कर Training देने तक, ज़िला प्रशासन ने इन महिलाओं की सफलता में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है |
     हम बार-बार सुनते आये हैं कि लोग कहते हैं – ‘कुछ बात है ऐसी कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ | वो बात क्या है, वो बात है, Flexibility – लचीलापन, Transformation | जो काल-बाह्य है उसे छोड़ना, जो आवश्यक है उसका सुधार स्वीकार करना | और हमारे समाज की विशेषता है – आत्मसुधार करने का निरंतर प्रयास, Self-Correction, ये भारतीय परम्परा, ये हमारी संस्कृति हमें विरासत में मिली है | किसी भी जीवन-समाज की पहचान होती है उसका Self Correcting Mechanism | सामाजिक कुप्रथाओं और कुरीतियों के ख़िलाफ सदियों से हमारे देश में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर लगातार प्रयास होते रहे हैं | अभी कुछ दिन पहले बिहार ने एक रोचक पहल की | राज्य में सामाजिक कुरीतियों को जड़ से मिटाने के लिए 13 हज़ार से अधिक किलोमीटर की विश्व की सबसे लम्बी मानव-श्रृंखला, Human Chain बनाई गयी | इस अभियान के द्वारा लोगों को बाल-विवाह और दहेज़-प्रथा जैसी बुराइयों के खिलाफ़ जागरूक किया गया | दहेज़ और बाल-विवाह जैसी कुरीतियों से पूरे राज्य ने लड़ने का संकल्प लिया | बच्चे, बुजुर्ग, जोश और उत्साह से भरे युवा, माताएँ, बहनें हर कोई अपने आप को इस जंग में शामिल किये हुए थे | पटना का ऐतिहासिक गाँधी मैदान से आरंभ हुई मानव-श्रृंखला राज्य की सीमाओं तक अटूट-रूप से जुड़ती चली गई | समाज के सभी लोगों को सही मायने में विकास का लाभ मिले इसके लिए ज़रुरी है कि हमारा समाज इन कुरीतियों से मुक्त हो | आइये हम सब मिलकर ऐसी कुरीतियों को समाज से ख़त्म करने की प्रतिज्ञा लें और एक New India, एक सशक्त एवं समर्थ भारत का निर्माण करें | मैं बिहार की जनता, राज्य के मुख्यमंत्री, वहाँ के प्रशासन और मानव –श्रृंखला में शामिल हर व्यक्ति की सराहना करता हूँ कि उन्होंने समाज कल्याण की दिशा में इतनी विशेष एवं व्यापक पहल की |
    मेरे प्यारे देशवासियो, मैसूर, कर्नाटक के श्रीमान् दर्शन ने MyGov पर लिखा है – उनके पिता के ईलाज़ पर महीने में दवाइयों का खर्च 6 हज़ार रूपये होता था | उन्हें पहले प्रधानमंत्री जन-औषधि योजना के बारे में जानकारी नहीं थी | लेकिन अब जब उन्हें जन-औषधि केंद्र के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने वहाँ से दवाइयाँ ख़रीदी तो उनका दवाइयों का खर्च 75 प्रतिशत तक कम हो गया | उन्होंने इच्छा जताई है कि मैं इसके बारे में ‘मन की बात’ कार्यक्रम में बात करूँ ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इसकी जानकारी पहुँचे और वे इसका लाभ ले सकें | पिछले कुछ समय से बहुत लोग मुझे इस विषय में लिखते रहते थे, बताते रहते हैं | मैंने भी कई लोगों के Video, Social Media पर भी देखे है जिन्होंने इस योजना का लाभ लिया है | और इस तरह की जानकारी जब मिलती है तो बहुत खुशी होती है | एक गहरा संतोष मिलता है | और मुझे यह भी बहुत अच्छा लगा कि श्रीमान् दर्शन जी के मन में ये विचार आया कि जो उन्हें मिला है, वो औरों को भी मिले | इस योजना के पीछे उद्देश्य है - Health Care को affordable बनाना और Ease of Living को प्रोत्साहित करना | जन-औषधि केन्द्रों पर मिलने वाली दवाएं बाज़ार में बिकने वाली Branded दवाइयों से लगभग 50% से 90% तक सस्ती हैं | इससे जन-सामान्य, विशेषकर प्रतिदिन दवाएं लेने वाले वरिष्ठ नागरिकों की बहुत आर्थिक मदद होती है, बहुत बचत होती है | इसमें ख़रीदी जानेवाली generic दवाएं World Health Organisation के तय standard के हिसाब से होती हैं | यही कारण है कि अच्छी Quality की दवाएं सस्ते दाम पर मिल जाती हैं | आज देशभर में तीन हज़ार से ज्यादा जन-औषधि केंद्र स्थापित किये जा चुके हैं | इससे न सिर्फ दवाइयाँ सस्ती मिल रही हैं बल्कि Individual Entrepreneurs के लिए भी रोज़गार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं | सस्ती दवाइयाँ प्रधानमंत्री भारतीय जन-औषधि केन्द्रों और अस्पतालों के ‘अमृत stores पर उपलब्ध हैं | इन सब के पीछे एक मात्र उद्देश्य है – देश के ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति को Quality and affordable health service उपलब्ध करवाना ताकि एक स्वस्थ और समृद्ध भारत का निर्माण किया जा सके |
          मेरे प्यारे देशवासियो, महाराष्ट्र से श्रीमान् मंगेश ने Narendra Modi Mobile App पर एक Photo, Share की | वो Photo ऐसी थी कि मेरा ध्यान उस Photo की ओर खींचा चला गया | वो फोटो ऐसी थी जिसमें एक पोता अपने दादा के साथ ‘Clean Morna River’ सफाई अभियान में हिस्सा ले रहा था | मुझे पता चला कि अकोला के नागरिकों ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत मोरना नदी को साफ़ करने के लिए स्वच्छता अभियान का आयोजन किया था | मोरना नदी पहले बारह महीने बहती थी लेकिन अब वो seasonal हो गई है | दूसरी पीड़ा की बात है कि नदी पूरी तरह से जंगली घास, जलकुम्भी से भर गई थी | नदी और उसके किनारे पर काफ़ी कूड़ा फेका जा रहा था | एक action plan तैयार किया गया और मकर-संक्रांति से एक दिन पहले 13 जनवरी को ‘Mission Clean Morna’  के प्रथम चरण के तहत चार किलोमीटर के क्षेत्र में चौदह स्थानों पर मोरना नदी के तट के दोनों किनारों की सफाई की गई | ‘Mission Clean Morna’ के इस नेक कार्य में अकोला के छह हज़ार से अधिक नागरिकों, सौ से अधिक NGOs , Colleges, Students, बच्चे, बुजुर्ग, माताएँ-बहनें हर किसी ने इसमें भाग लिया | 20 जनवरी 2018 को भी ये स्वच्छता-अभियान उसी तरह जारी रखा गया और मुझे बताया गया है कि जब तक मोरना नदी पूरी तरह से साफ़ नही हो जाती, ये अभियान हर शनिवार की सुबह को चलेगा | यह दिखाता है कि अगर व्यक्ति कुछ करने की ठान ले तो नामुमकिन कुछ भी नहीं है | जन-आंदोलन के माध्यम से बड़े से बड़े बदलाव लाये जा सकते हैं | मैं अकोला की जनता को, वहाँ के ज़िला एवं नगर-निगम के प्रशासन को इस काम को जन-आंदोलन बनाने के लिए जुटे हुए सब नागरिकों को, आपके इन प्रयासों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ और आप का ये प्रयास देश के अन्य लोगों को भी प्रेरित करेगा |
    मेरे प्यारे देशवासियो, इन दिनों पद्म-पुरस्कारों के संबंध में काफी चर्चा आप भी सुनते होंगे | अख़बारों में भी इस विषय में, T.V. पर भी इस पर ध्यान आकर्षित होता है | लेकिन थोड़ा अगर बारीकी से देखेंगे तो आपको गर्व होगा | गर्व इस बात का कि कैसे-कैसे महान लोग हमारे बीच में हैं और स्वाभाविक रूप से इस बात का भी गर्व होगा कि कैसे आज हमारे देश में सामान्य व्यक्ति बिना किसी सिफ़ारिश के उन ऊँचाइयों तक पहुँच रहें हैं | हर वर्ष पद्म-पुरस्कार देने की परम्परा रही है लेकिन पिछले तीन वर्षों में इसकी पूरी प्रक्रिया बदल गई है | अब कोई भी नागरिक किसी को भी nominate कर सकता है | पूरी प्रक्रिया online हो जाने से transparency आ गई है | एक तरह से इन पुरस्कारों की चयन-प्रक्रिया का पूरा transformation हो गया है | आपका भी इस बात पर ध्यान गया होगा कि बहुत सामान्य लोगों को पद्म-पुरस्कार मिल रहे हैं | ऐसे लोगों को पद्म-पुरस्कार दिए गए हैं जो आमतौर पर बड़े-बड़े शहरों में, अख़बारों में, टी.वी. में, समारोह में नज़र नहीं आते हैं | अब पुरस्कार देने के लिए व्यक्ति की पहचान नहीं, उसके काम का महत्व बढ़ रहा है | आपने सुना होगा श्रीमान् अरविन्द गुप्ता जी को, आपको जान करके ख़ुशी होगी, IIT कानपुर के छात्र रहे अरविन्द जी ने बच्चों के लिए खिलौने बनाने में अपना सारा जीवन खपा दिया | वे चार दशकों से कचरे से खिलौने बना रहे हैं ताकि बच्चों में विज्ञान के प्रति जिज्ञासा बढ़ा सकें | उनकी कोशिश है कि बच्चे बेकार चीज़ों से वैज्ञानिक प्रयोगों की ओर प्रेरित हों, इसके लिए वे देशभर के तीन हज़ार स्कूलों में जाकर 18 भाषाओं में बनी फ़िल्में दिखाकर बच्चों को प्रेरित कर रहे हैं | कैसा अद्भुत जीवन, कैसा अद्भुत समर्पण! एक ऐसी ही कहानी कर्नाटक के सितावा जोद्दती (SITAVAA JODATTI) की है | इन्हें महिला-सशक्तीकरण की देवी ऐसे ही नहीं कहा गया है | पिछले तीन दशकों से बेलागवी (BELAGAVI) में इन्होंने अनगिनत महिलाओं का जीवन बदलने में महान योगदान दिया है | इन्होंने सात वर्ष की आयु में ही स्वयं को देवदासी के रूप में समर्पित कर दिया था | लेकिन फिर देवदासियों के कल्याण के लिए ही अपना पूरा जीवन लगा दिया | इतना ही नहीं, इन्होंने दलित महिलाओं के कल्याण के लिए भी अभूतपूर्व कार्य किये हैं | आपने नाम सुना होगा मध्य प्रदेश के भज्जू श्याम के बारे में, श्रीमान् भज्जू श्याम का जन्म एक बिलकुल ग़रीब परिवार, आदिवासी परिवार में हुआ था | वे जीवन यापन के लिए सामान्य नौकरी करते थे लेकिन उनको पारम्परिक आदिवासी painting बनाने का शौक था | आज इसी शौक की वजह से इनका भारत ही नहीं, पूरे विश्व में सम्मान है | Netherlands, Germany, England, Italy जैसे कई देशों में इनकी painting प्रदर्शनी लग चुकी है| विदेशों में भारत का नाम रोशन करने वाले भज्जू श्याम जी की प्रतिभा को पहचाना गया और उन्हें पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया |         
केरल की आदिवासी महिला लक्ष्मीकुट्टी की कहानी सुनकर आप सुखद आश्चर्य से भर जायेंगे | लक्ष्मीकुट्टी, कल्लार में शिक्षिका हैं और अब भी घने जंगलों के बीच आदिवासी इलाके में ताड़ के पत्तों से बनी झोपड़ी में रहती हैं | उन्होंने अपनी स्मृति के आधार पर ही पांच सौ herbal medicine बनाई हैं | जड़ी-बूटियों से दवाइयाँ बनाई है | सांप काटने के बाद उपयोग की जाने वाली दवाई बनाने में उन्हें महारत हासिल है | लक्ष्मी जी herbal दवाओं की अपनी जानकारी से लगातार समाज की सेवा कर रही हैं | इस गुमनाम शख्शियत को पहचान कर समाज में इनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया | मैं आज एक और नाम का भी जिक्र करने का मेरा मन करता है | पश्चिम बंगाल की 75 वर्षीय सुभासिनी मिस्त्री को भी | उन्हें पुरस्कार के लिए चुना गया | सुभासिनी मिस्त्री एक ऐसी महिला हैं, जिन्होंने अस्पताल बनाने के लिए दूसरों के घरों में बर्तन मांजे, सब्जी बेची | जब ये 23 वर्ष की थीं तो उपचार नहीं मिलने से इनके पति की मृत्यु हो गई थी और इसी घटना ने उन्हें गरीबों के लिए अस्पताल बनाने के लिए प्रेरित किया | आज इनकी कड़ी मेहनत से बनाए गए अस्पताल में हजारों गरीबों का नि:शुल्क इलाज किया जाता है | मुझे पूरा विश्वास है कि हमारी बहुरत्ना-वसुंधरा में ऐसे कई नर-रत्न हैं, कई नारी-रत्न हैं जिनको न कोई जानता है, न कोई पहचानता है | ऐसे व्यक्तियों की पहचान न बनना, उससे समाज का भी घाटा हो जाता है | पद्म-पुरस्कार एक माध्यम है लेकिन मैं देशवासियों को भी कहूँगा कि हमारे आस-पास समाज के लिए जीने वाले, समाज के लिए खपने वाले, किसी न किसी विशेषता को ले करके जीवन भर कार्य करने वाले लक्षावधि लोग हैं | कभी न कभी उनको समाज के बीच में लाना चाहिए | वो मान-सम्मान के लिए काम नहीं करते हैं लेकिन उनके कार्य के कारण हमें प्रेरणा मिलती है | कभी स्कूलों में, colleges में ऐसे लोगों को बुला करके उनके अनुभवों को सुनना चाहिए | पुरस्कार से भी आगे, समाज में भी कुछ प्रयास होना चाहिए |
    मेरे प्यारे देशवासियो, हर वर्ष 9 जनवरी को हम प्रवासी भारतीय दिवस मनाते हैं | यही 9 जनवरी है, जब पूज्य महात्मा गाँधी SOUTH AFRICA से भारत लौटे थे | इस दिन हम भारत और विश्व भर में रह रहे भारतीयों के बीच, अटूट-बंधन का जश्न मनाते हैं | इस वर्ष प्रवासी भारतीय दिवस पर हमने एक कार्यक्रम आयोजित किया था जहाँ विश्व भर में रह रहे भारतीय-मूल के सभी सांसदों को और मेयरों  ( MAYORS)  को आमंत्रित किया था | आपको यह जानकर खुशी होगी कि उस कार्यक्रम में Malaysia, New Zealand, Switzerland, Portugal, Mauritius, Fiji, Tanzania, Kenya, Canada, Britain, Surinam, दक्षिण अफ्रीका और America  से, और भी कई देशों से वहाँ जहाँ-जहाँ हमारे मेयर हैं मूल- भारतीय, जहाँ-जहाँ सांसद है मूल-भारतीय, उन सब ने भाग लिया था | मुझे खुशी है कि विभिन्न देशों में रह रहे भारतीय-मूल के लोग उन देशों की सेवा तो कर ही रहे हैं साथ ही साथ, वे भारत के साथ भी अपने मजबूत संबंध बनाए रखे हैं | इस बार यूरोपीय संघ, यूरोपियन यूनियन ने मुझे कैलेंडर भेजा है जिसमें उन्होनें यूरोप के विभिन्न देशों में रह रहे भारतीयों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदानों को एक अच्छे ढंग से दर्शाया है | हमारे मूल-भारतीय लोग जो यूरोप के भिन्न-भिन्न देशों में बस रहे हैं - कोई CYBER SECURITY में काम कर रहा है, तो कोई आयुर्वेद को समर्पित है, कोई अपने संगीत से समाज के मन को डुलाता लाता है तो कोई अपनी कविताओं से | कोई climate change पर शोध कर रहा है तो कोई भारतीय ग्रंथों पर काम कर रहा है | किसी ने ट्रक चलाकर गुरुद्वारा खड़ा किया है तो किसी ने मस्जिद बनाई है | यानी जहाँ भी हमारे लोग हैं, उन्होंने वहाँ की धरती को किसी न किसी तरीके से सुसज्जित किया है | मैं धन्यवाद देना चाहूँगा यूरोपीय यूनियन के इस उल्लेखनीय कार्य के लिए, भारतीय मूल के लोगों को recognise करने के लिए और उनके माध्यम से दुनिया भर के लोगों को जानकारी देने के लिए भी |
      30 जनवरी को पूज्य बापू की पुण्य-तिथि है, जिन्होंने हम सभी को एक नया रास्ता दिखाया है | उस दिन हम ‘शहीद दिवस’ मनाते हैं | उस दिन हम देश की रक्षा में अपनी जान गवां देने वाले महान शहीदों को 11 बजे श्रद्दांजलि अर्पित करते हैं | शांति और अहिंसा का रास्ता, यही बापू का रास्ता | चाहे भारत हो या दुनिया, चाहे व्यक्ति हो परिवार हो या समाज-पूज्य बापू जिन आदर्शों को ले करके जिए, पूज्य बापू ने जो बातें हमें बताई, वे आज भी अत्यंत relevant हैं | वे सिर्फ कोरे सिद्दांत नहीं थे | वर्तमान में भी हम डगर-डगर पर देखते हैं कि बापू की बातें कितनी सही थीं | अगर हम संकल्प करें कि बापू के रास्ते पर चलें -जितना चल सके, चलें - तो उससे बड़ी श्रद्दांजलि क्या हो सकती है?
     मेरे प्यारे देशवासियो, आप सब को 2018 की शुभकामनायें देते हुए, मेरी वाणी को विराम देता हूँ | बहुत-बहुत धन्यवाद  | नमस्कार |
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